पेड़ की आत्मकथा – ped ki aatmkatha

पेड़ की आत्मकथा - ped ki aatmkatha
पेड़ की आत्मकथा – ped ki aatmkatha

मैं एक पेड़ हूँ, मेरी जन्मकथा बहुत रोमांचक है। मेरी उत्पती धरती से एक बिज के माध्यम से हुई । उस समय था जब जंगलों में फूल, पेड़ और जानवरों की बहार थी और बारिश का मौसम था . मेरी बिज ने जमीन में घुसते ही रेतीले मिट्टी ने उसे गिला कर दिया और तब मेरा जन्म हुवा.

समय बितते गया और मैं धीरे-धीरे बड़ता गया। मेरी डालों ने ऊपर की ओर फैलाव लिया और मेरी पत्तियाँ हरी-भरी हो गईं। मेरे शाखाओं पर फल और फूल खिलने लगे। मेरे घने शालाएँ के वजह से छाया रहने लगी

विभिन्न प्रकार के पक्षी, पशु और कीट पर मेरा सहारा लेते और जीवन जीते । मैं उनको आहार, आवास और सुरक्षा प्रदान करता था। पंछी मेरी शाखाओं पर घोंसले बनाते थे और मेरी छाया में लोग आराम करते थे।

लेकिन एक दिन इन्सान आया और मेरी शाखाओं को उसने काट दिया । मुझे काटने के लिए एक व्यक्ति ने उसे आदेश दिया था। सड़क निर्माण के लिए जमीन की आवश्यकता थी इसलिये उसने मेरी कटाई की .

मुझे विरोध करने की कोई शक्ति कुदरत ने नहीं दी, मेरी शाखाएँ कट गईं और मेरी छाया गायब हो गई। मेरे शाखाये और पत्तियाँ धरती पर बिखर गईं।

लेकिन मेरी कहानी यहां खत्म नहीं होती है। मेरी बीज धरती में था और समय के साथ फिर से दुसरे जगह निकला । मेरा प्राकृतिक चक्र फिर से चल पड़ा और मैंने फिर से नई पत्तियाँ और शाखाएँ उत्पन्न कीं। मेरी वृद्धि चली गई और मेरी दृढ़ता फिरसे दिखाई देने लगी।

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धीरे-धीरे, मेरी छाया फिर से लौट आई और जीवन को नई आशा मिली। लोग फिर से मेरी आपूर्ति का लाभ उठाने लगे, पक्षी और पशु मेरी शाखाओं पर आश्रय लेने लगे .

समय बितते गए, और मेरी गहरी जड़ें मजबूत हो गईं। मैं एक बड़ा और विशाल वृक्ष बन गया था, जो आसपास के आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण था। लोग फिर से मेरी छाया में आराम करते थे और मेरी सुंदरता की प्रशंसा करते थे। मेरी जीवनशैली फिर से पर्यावरण को संतुष्ट कर रही थी।

मेरे फल खाने बन्दर पंछी और इन्सान आने लगे वह मुझेसे फल गिराते और मस्त खाते उन्हें देखकर मै ध्यन हो गया .

मुझे इन्सान से डर लगता है वह अपने निजी हेतु के लिए मुझे काट देता है . मै इन्सान को बताना चाहता हु की किसी का जीवन समाप्त करने का किसको हक़ नहीं .

पेड़ निसर्ग को संतुलित बनता है. पेड़ से सभी जरुरत की चीजे मिलती है जैसे फल , लकड़ा , प्राणवायु , छाव इसलिये पेड़ का आभार करे नाकि उसे काटे.

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